हँसती है एक आँख मेरी, तो रोती है दूसरी
जीवन का एक स्वरूप हसता है, तो दूसरा है रोता
स्वीकारता हूँ मैं दोनों स्वरूपों को, नत मस्तक होकर
अभिमान तो गया मेरा, पर स्वाभिमान भी गया जब मेरा
तब मिले मेरे प्रभु मुझे, कमल की तरह
खिल गये दो नयन मेरे, चली गई जिंदगी से खामोशी
मिल गई मंझील मुझे
- संत श्री अल्पा माँ